Blog by VPyoga

Patanjali Yogsutra (195 sutra)

प्रथम पाद समाधिपाद – 51 (Patanjali Yogsutra ) 1.अथयोगानुशासनम्। अर्थ: अब योग का अनुशासन (शिक्षा या शास्त्र) शुरू होता है। 2. योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः। अर्थ: योग का अर्थ है चित्त की वृत्तियों का निरोध  (रोकना या नियंत्रण)। 3. तदा द्रष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम्। अर्थ: तब (जब चित्त शांत होता है), देखने वाला (पुरुष)  अपने स्वरूप में स्थित होता है। 4. वृत्तिसारूप्यमितरत्र। अर्थ: अन्यथा (जब चित्त शांत नहीं होता), आत्मा चित्त की वृत्तियों  के साथ एकरूप हो जाता है। 5. वृत्तयः पंचतय्यः क्लिष्टाक्लिष्टाः। अर्थ: चित्त की वृत्तियाँ पाँच प्रकार की होती हैं – वे कष्टदायक (क्लिष्ट) या अक्लिष्ट भी हो सकती हैं। 6. प्रमाणविपर्ययविकल्पनिद्रास्मृतयः। अर्थ: वे पाँच वृत्तियाँ हैं – प्रमाण, विपर्यय, विकल्प,  निद्रा और स्मृति। 7. प्रत्यक्षानुमानागमाः प्रमाणानि। अर्थ: प्रत्यक्ष (सीधा अनुभव), अनुमान और शास्त्र का प्रमाण – ये तीन प्रमाण के प्रकार हैं। 8. विपर्ययो मिथ्याज्ञानमतद्रूपप्रतिष्ठम्। अर्थ: विपर्यय (भ्रम) वह मिथ्या ज्ञान है, जो वस्तु के वास्तविक  स्वरूप के विपरीत होता है। 9. शब्दज्ञानानुपाती वस्तुशून्यो विकल्पः। अर्थ: विकल्प वह ज्ञान है जो केवल शब्दों के आधार पर होता है,  लेकिन उसका कोई वस्तुगत आधार नहीं होता। 10. अभावप्रत्ययालम्बना वृत्तिर्निद्रा। अर्थ: जो वृत्ति अभाव (कुछ भी न होने) का अनुभव कराती है,  वह निद्रा (नींद) है। Please visit above Hatha yoga texts 11. अनुभूतविषयासंप्रमोषः स्मृतिः। अर्थ: जो वस्तुएँ अनुभव की गई हैं, उनका न भूलना स्मृति  कहलाता है। 12. अभ्यासवैराग्याभ्यां तन्निरोधः। अर्थ: अभ्यास और वैराग्य से उन वृत्तियों का निरोध (नियंत्रण) होता है। 13. तत्र स्थितौ यत्नोऽभ्यासः। अर्थ: चित्त को एक स्थिति में स्थिर रखने का प्रयास – यही अभ्यास है। 14. स तु दीर्घकालनैरन्तर्यसत्कारासेवितो दृढभूमिः। अर्थ: जब अभ्यास लंबे समय तक, बिना रुके और श्रद्धा से  किया जाए, तब वह दृढ होता है। 15. दृष्टानुश्रविकविषयवितृष्णस्य वशीकारसंज्ञा वैराग्यम्। अर्थ: जो व्यक्ति दृश्य और श्रवण इन्द्रियों के विषयों में भी राग  नहीं रखता, उसकी वशीकरण शक्ति वैराग्य कहलाती है। 16. तत्परं पुरुषख्यातेर्गुणवैतृष्ण्यम्। […]

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