Blog by VPyoga

Patanjali Yogsutra (195 sutra)

प्रथम पाद

समाधिपाद51

(Patanjali Yogsutra )

1.अथयोगानुशासनम्।

अर्थ: अब योग का अनुशासन (शिक्षा या शास्त्र) शुरू होता है।


2. योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः।

अर्थ: योग का अर्थ है चित्त की वृत्तियों का निरोध 

(रोकना या नियंत्रण)।


3. तदा द्रष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम्।

अर्थ: तब (जब चित्त शांत होता है), देखने वाला (पुरुष) 

अपने स्वरूप में स्थित होता है।


4. वृत्तिसारूप्यमितरत्र।

अर्थ: अन्यथा (जब चित्त शांत नहीं होता), आत्मा चित्त की वृत्तियों 

के साथ एकरूप हो जाता है।


5. वृत्तयः पंचतय्यः क्लिष्टाक्लिष्टाः।

अर्थ: चित्त की वृत्तियाँ पाँच प्रकार की होती हैं – वे कष्टदायक (क्लिष्ट) या अक्लिष्ट भी हो सकती हैं।


6. प्रमाणविपर्ययविकल्पनिद्रास्मृतयः।

अर्थ: वे पाँच वृत्तियाँ हैं – प्रमाण, विपर्यय, विकल्प, 

निद्रा और स्मृति।


7. प्रत्यक्षानुमानागमाः प्रमाणानि।

अर्थ: प्रत्यक्ष (सीधा अनुभव), अनुमान और शास्त्र का प्रमाण – ये तीन प्रमाण के प्रकार हैं।


8. विपर्ययो मिथ्याज्ञानमतद्रूपप्रतिष्ठम्।

अर्थ: विपर्यय (भ्रम) वह मिथ्या ज्ञान है, जो वस्तु के वास्तविक

 स्वरूप के विपरीत होता है।


9. शब्दज्ञानानुपाती वस्तुशून्यो विकल्पः।

अर्थ: विकल्प वह ज्ञान है जो केवल शब्दों के आधार पर होता है,

 लेकिन उसका कोई वस्तुगत आधार नहीं होता।


10. अभावप्रत्ययालम्बना वृत्तिर्निद्रा।

अर्थ: जो वृत्ति अभाव (कुछ भी न होने) का अनुभव कराती है, 

वह निद्रा (नींद) है।

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11. अनुभूतविषयासंप्रमोषः स्मृतिः।

अर्थ: जो वस्तुएँ अनुभव की गई हैं, उनका न भूलना स्मृति 

कहलाता है।


12. अभ्यासवैराग्याभ्यां तन्निरोधः।

अर्थ: अभ्यास और वैराग्य से उन वृत्तियों का निरोध (नियंत्रण) होता है।


13. तत्र स्थितौ यत्नोऽभ्यासः।

अर्थ: चित्त को एक स्थिति में स्थिर रखने का प्रयास – यही अभ्यास है।


14.  तु दीर्घकालनैरन्तर्यसत्कारासेवितो दृढभूमिः।

अर्थ: जब अभ्यास लंबे समय तक, बिना रुके और श्रद्धा से

 किया जाए, तब वह दृढ होता है।


15. दृष्टानुश्रविकविषयवितृष्णस्य वशीकारसंज्ञा वैराग्यम्।

अर्थ: जो व्यक्ति दृश्य और श्रवण इन्द्रियों के विषयों में भी राग

 नहीं रखता, उसकी वशीकरण शक्ति वैराग्य कहलाती है।


16. तत्परं पुरुषख्यातेर्गुणवैतृष्ण्यम्।

अर्थ: जब पुरुष (आत्मा) की साक्षात्कार की तीव्र इच्छा हो 

और प्रकृति के गुणों में भी राग न हो, तो वह परा वैराग्य होता है।


17. वितर्कविचारानन्दास्मितारूपानुगमात् संप्रज्ञातः।

अर्थ: जब ध्यान में वितर्क (स्थूल विचार), विचार (सूक्ष्म), आनंद

 और अस्मिता (अहंता) मौजूद हो, तो उसे संप्रज्ञात समाधि कहते हैं।


18. विरामप्रत्ययाभ्यासपूर्वः संस्कारशेषोऽन्यः।

अर्थ: जब केवल संस्कार शेष रह जाते हैं और वृत्तियाँ पूर्ण विराम में होती हैं, तब आसंप्रज्ञात समाधि होती है।


19. भावप्रत्ययो विदेहप्रकृतिलयानाम्।

अर्थ: जो लोग देह से रहित या प्रकृति में लीन होते हैं, वे जन्म 

से ही समाधि में रहते हैं।


20. श्रद्धावीर्यस्मृतिसमाधिप्रज्ञापूर्वक इतरेषाम्।

अर्थ: अन्य साधकों के लिए श्रद्धा, उत्साह, स्मृति, समाधि और प्रज्ञा के द्वारा समाधि प्राप्त होती है।


21. तीव्रसंवेगानामासन्नः।

अर्थ: जिनका उत्साह तीव्र होता है, उनके लिए समाधि निकट

 होती है।


22. मृदुमध्याधिमात्रत्वात्ततोऽपि विशेषः।

अर्थ: तीव्रता में भी मृदु (मुलायम), मध्यम और तीव्र – ऐसे तीन भेद होते हैं।


23. ईश्वरप्रणिधानाद्वा।

अर्थ: ईश्वर में पूर्ण रूप से समर्पित हो जाने से भी समाधि 

प्राप्त होती है।


24. क्लेशकर्मविपाकाशयैरपरामृष्टः पुरुषविशेष ईश्वरः।

अर्थ: ईश्वर एक विशेष पुरुष है, जो कष्ट, कर्म, उनके फल और

 संस्कारों से अछूता है।


25. तत्र निरतिशयं सर्वज्ञबीजम्।

अर्थ: उस ईश्वर में असीम सर्वज्ञता (सब कुछ जानने का बीज) 

विद्यमान है।


26. स पूर्वेषामपि गुरुः कालेनानवच्छेदात्।

अर्थ: ईश्वर, प्राचीनतम गुरुओं के भी गुरु हैं क्योंकि उनका अस्तित्व काल से परे (अनादि) है।


27. तस्य वाचकः प्रणवः।

अर्थ: उस ईश्वर का प्रतीक शब्द है – ” (प्रणव)


28. तज्जपस्तदर्थभावनम्।

अर्थ: उस “ॐ” का जप और उसके अर्थ का चिंतन करना चाहिए।


29. ततः प्रत्यक्चेतनाधिगमोऽप्यन्तरायाभावश्च।

अर्थ: इसके अभ्यास से आंतरिक चेतना का अनुभव होता है

 और साधना में आने वाले विघ्नों का नाश होता है।


30. व्याधिस्त्यानसंशयप्रमादालस्याविरतिभ्रान्तिदर्शनालब्ध

भूमिकत्वानवस्थितत्वानि चित्तविक्षेपास्तेऽन्तरायाः।

अर्थ: रोग, मानसिक जड़ता, संदेह, प्रमाद, आलस्य, इन्द्रियों पर

 असंयम, भ्रम, ध्यान की अवस्था न प्राप्त होना और ध्यान में स्थिर न रह पाना – ये चित्त की विक्षेप (विघ्न) के कारण हैं।


31. दुःखदौर्मनस्याङ्गमेजयत्वश्वासप्रश्वासा विक्षेपसहभुवः।

अर्थ: ये विघ्न मानसिक और शारीरिक लक्षणों जैसे – दुःख, मानसिक अशांति, शरीर में कंपन, असंतुलित 

श्वास-प्रश्वास आदि के साथ प्रकट होते हैं।


32. तत्प्रतिषेधार्थमेकतत्त्वाभ्यासः।

अर्थ: इन विघ्नों को दूर करने के लिए एक तत्व (ध्यान के एक विषय) का अभ्यास करना चाहिए।


33. मैत्रीकरुणामुदितोपेक्षाणां सुखदुःखपुण्यापुण्यविषयाणां भावनातश्चित्तप्रसादनम्।

अर्थ: चित्त को प्रसन्न (शांत) रखने के लिए चार भावनाओं का अभ्यास करें:
मैत्री (मित्रतासुखी लोगों के लिए,
करुणा दुखियों के लिए,
मुदिता पुण्यात्माओं के लिए,
उपेक्षा पापियों के लिए।


34. प्रच्छर्दनविधारणाभ्यां वा प्राणस्य।

अर्थ: श्वास की गति को नियंत्रित करके भी चित्त की शुद्धि की जा सकती है।


35. विषयवती वा प्रवृत्तिरुत्पन्ना मनसः स्थितिनिबन्धिनी।

अर्थ: जब मन इन्द्रियों के किसी एक विषय पर स्थिर होता है, तब भी चित्त स्थिर हो जाता है।


36. विषोका वा ज्योतिष्मती।

अर्थ: जो ध्यानशक्ति प्रकाशमय हो और जिसमें शोक न हो, उस पर भी ध्यान किया जा सकता है।


37. वीतरागविषयं वा चित्तम्।

अर्थ: किसी वैराग्यवान व्यक्ति के चित्त का ध्यान करके भी स्थिरता प्राप्त हो सकती है।


38. स्वप्ननिद्राज्ञानालम्बनं वा।

अर्थ: स्वप्न या निद्रा में आए हुए ज्ञान का ध्यान कर भी चित्त को स्थिर किया जा सकता है।


39. यथाभिमतध्यानाद्वा।

अर्थ: मनचाही किसी भी शुभ वस्तु पर ध्यान करके भी चित्त को स्थिर किया जा सकता है।


40. परमाणुपरममहत्त्वान्तोऽस्य वशीकारः।

अर्थ: साधक की ध्यान शक्ति इतनी बढ़ सकती है कि वह परमाणु से लेकर महत् (विशाल) 

तक को अपने ध्यान से वश में कर सकता है।


41. क्षीणवृत्तिरभिजातस्येव मणेर्ग्रहीत्रग्रहणग्राह्येषु तत्स्थितौ यथा ततः ज्ञातृस्वरूपम्।

अर्थ: जब चित्त की वृत्तियाँ शांत हो जाती हैं, तब वह स्वच्छ मणि की तरह हो जाता है, जो ज्ञाता

 (देखने वाला), ज्ञान (ग्रहण की प्रक्रिया), और ज्ञेय (जो देखा जा रहा है) – इन तीनों को उसी रूप में दिखाता है।


42. तत्र शब्दार्थज्ञानविकल्पैः संकीर्णा सवितर्का समाधिः।

अर्थ: जब समाधि में शब्द, अर्थ और ज्ञान – ये तीनों मिलते हैं, तो उसे सवितर्क समाधि कहते हैं (स्थूल वस्तुओं पर ध्यान के साथ तर्क रहता है)।


43. स्मृतिपरिशुद्धौ स्वरूपशून्येवार्थमात्रनिर्भासा निर्वितर्का।

अर्थ: जब स्मृति शुद्ध हो जाती है और केवल वस्तु ही दिखाई देती है, तब वह निर्वितर्क समाधि 

होती है (तर्करहित स्थूल ध्यान)।


44. एतयैव सविचारा निर्विचारा  सूक्ष्मविषयाव्याख्याता।

अर्थ: इसी प्रकार सूक्ष्म वस्तुओं के ध्यान में, सविचार और निर्विचार समाधियाँ होती हैं।


45. सूक्ष्मविषयत्वं चालिङ्गपर्यवसानम्।

अर्थ: जो सूक्ष्म ध्यान का विषय होता है, वह अलींग (प्रकृति की मूल अवस्था) तक पहुँच सकता है।


46. ता एव सबीजः समाधिः।

अर्थ: ये सभी ध्यान की अवस्थाएँ “सबीज समाधि” हैं – अर्थात् इनमें अभी संस्कार (बीज) शेष रहते हैं।


47. निर्विचारवैशारद्येऽध्यात्मप्रसादः।

अर्थ: निर्विचार समाधि में निपुणता आने पर अंतःकरण (मन) में गहन शुद्धता आती है।


48. ऋतम्भरा तत्र प्रज्ञा।

अर्थ: उस अवस्था में ज्ञान सत्य और यथार्थ (ऋत) से भरपूर होता है।


49. श्रुतानुमानप्रज्ञाभ्यामन्यविषया विशेषार्थत्वात्।

अर्थ: यह प्रज्ञा श्रुति (शास्त्रों) और अनुमान से प्राप्त ज्ञान से भिन्न और श्रेष्ठ होती है क्योंकि

 इसका विषय प्रत्यक्ष और विशिष्ट होता है।


50. तज्जः संस्कारोऽन्यसंस्कारप्रतिबन्धी।

अर्थ: उस ऋतम्भरा प्रज्ञा से उत्पन्न संस्कार अन्य (अविध्या आदि) संस्कारों को रोकने वाला होता है।


51. तस्यापि निरोधे सर्वनिरोधान्निर्बीजः समाधिः॥

अर्थ: जब इस अंतिम संस्कार का भी निरोध हो जाता है, तब निर्बीज समाधि (जहाँ कोई बीज शेष नहीं रहता) प्राप्त होती है।


साधनपाद 55

(Patanjali Yogsutra)

1. तपःस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि क्रियायोगः॥

अर्थ: तप (अनुशासन), स्वाध्याय (शास्त्रों का अध्ययन) और ईश्वर में पूर्ण समर्पण – इन तीनों को क्रिया योग कहते हैं।


2. समाधिभावनार्थः क्लेशतनूकरणार्थश्च॥

अर्थ: यह क्रियायोग समाधि की प्राप्ति और क्लेशों (मानसिक दुखों) को कम करने के लिए है।


3. अविद्यास्मितारागद्वेषाभिनिवेशाः क्लेशाः॥

अर्थ: अविद्याअस्मिता (अहंकार), राग (आसक्ति), द्वेष और अभिनिवेश (मृत्यु का भय) – ये पाँच क्लेश (मानसिक अशांति के कारण) हैं।


4. अविद्या क्षेत्रं उत्तरेषां प्रसुप्ततनुविच्छिन्नोदाराणाम्॥

अर्थ: इन सभी क्लेशों की जड़ अविद्या है, जो कभी सुप्त, तनु (कमज़ोर), विच्छिन्न (रुक-रुककर) या उदीर्ण (जागरित) रूप में प्रकट होती है।


5. अनित्याशुचिदुःखनात्मसु नित्यशुचिसुखात्मख्यातिरविद्या॥

अर्थ: जो अनित्य, अशुद्ध, दुःखमय और अनात्मा है – उसे नित्य, शुद्ध, सुखद और आत्मा मान लेना अविद्या है।


6. दृष्टृदृश्योः संयोगोऽस्मिता॥

अर्थ: देखने वाले (आत्मा) और दृश्य (मन, बुद्धि आदि) को एक मान लेना ही अस्मिता (अहंकार) है।


7. सुखानुशयी रागः॥

अर्थ: सुख का अनुभव होने पर उसमें आसक्ति पैदा हो जाती है – यही राग है।


8. दुःखानुशयी द्वेषः॥

अर्थ: दुःख का अनुभव होने पर उससे घृणा या नफ़रत होना – यही द्वेष है।


9. स्वरसवाही विदुषोऽपि तथारूढोऽभिनिवेशः॥

अर्थ: मृत्यु का भय (अभिनिवेश) – ज्ञानी व्यक्ति में भी बना रहता है, यह स्वाभाविक (स्वरसवाहित) होता है।


10. ते प्रतिप्रसवहेयाः सूक्ष्माः॥

अर्थ: जब ये क्लेश सूक्ष्म अवस्था में होते हैं, तब उनका नाश प्रत्याहार (प्रकृति की ओर लौटाना) से होता है।


11. ध्यानहेयास्तद्वृत्तयः॥

अर्थ: जब ये क्लेश सक्रिय हो जाते हैं, तब उनकी वृत्तियों का नाश ध्यान (ध्यान की शक्ति) से किया जा सकता है।


12. क्लेशमूलः कर्माशयो दृष्टादृष्टजन्मवेदनीयः॥

अर्थ: क्लेशों से उत्पन्न कर्मों के संस्कार (कर्माशय) होते हैं, जिनका फल इस जन्म में या भविष्य में भोगना पड़ता है।


13. सत्यासतीहिपाकः॥

अर्थ: जब तक कर्माशय विद्यमान हैं, तब तक जन्म, जीवन, अनुभव और मृत्यु का चक्र चलता रहेगा।


14. ते ह्लादपरितापफलाः पुण्यापुण्यहेतुत्वात्॥

अर्थ: इन कर्मों के फल सुखद (ह्लाद) या दुखद (परिताप) हो सकते हैं, यह इस बात पर निर्भर करता है कि वे पुण्य के कारण हैं या पाप के।


15. परिणामतापसंस्कारदुःखैर्गुणवृत्तिविरोधाच्च दुःखमेव सर्वं विवेकिनः॥

अर्थ: परिवर्तन, वासनाओं का ताप, संस्कारों का बंधन और गुणों के विरोध से विवेकी जन के लिए सब कुछ दुःख ही है।


16. हेयं दुःखमनागतम्॥

अर्थ: जो दुःख अभी आया नहीं है, उसे टालना ही लक्ष्य होना चाहिए।


17. दृष्टृदृश्ययोः संयोगो हेयहेतु

अर्थ: आत्मा और दृश्य (प्रकृति) के संयोग से ही यह दुःख उत्पन्न होता है – यह संयोग ही दुःख का कारण है।


18. प्रकाशक्रियास्थितिशीलं भूतेन्द्रियात्मकं भोगापवर्गार्थं दृश्यम्॥

अर्थ: प्रकाश (सत्त्व), क्रिया (रज) और स्थिरता (तम) से बना हुआ जो दृश्य (प्रकृति) है, वह पंचमहाभूतों और इन्द्रियों से युक्त है और उसका उद्देश्य आत्मा को भोग और मोक्ष का अनुभव कराना है।


19. विशेषाविशेषलिङ्गमात्रालिङ्गानि गुणपर्वाणि॥

अर्थ: दृश्य जगत चार रूपों में है:

  1. विशेष – स्थूल वस्तुएँ,
  2. अविशेष – तन्मात्राएँ,
  3. लिङ्गमात्र – सूक्ष्म प्रकृति,
  4. अलिङ्ग – मूल प्रकृति।

20. दृष्टा दृष्टिमात्रः शुद्धोऽपि प्रत्ययानुपश्यः॥

अर्थ: देखने वाला (पुरुष) केवल देखने की शक्ति है, वह शुद्ध है, परंतु चित्त की वृत्तियों के माध्यम से वस्तुओं को देखता है।


21. तदर्थ एव दृश्यस्यात्मा॥

अर्थ: दृश्य का अस्तित्व केवल पुरुष (आत्मा) के अनुभव के लिए है।


22. कृतार्थं प्रतिनष्टमप्यनष्टं तदन्यसाधारणत्वात्॥

अर्थ: जब एक पुरुष के लिए दृश्य का उद्देश्य पूर्ण हो जाता है, तब भी वह अन्य पुरुषों के लिए अस्तित्व में बना रहता है।


23. स्वस्वामिशक्त्योः स्वरूपोपलब्धिहेतुः संयोगः॥

अर्थ: आत्मा (स्वामी) और चित्त (स्व) की शक्तियों के परस्पर संबंध से ही उनके स्वरूप का अनुभव होता है। यही संयोग है।


24. तस्य हेतुरविद्या॥

अर्थ: आत्मा और चित्त का संयोग अविद्या के कारण होता है।


25. तदभावात्संयोगाभावो हानं तद्दृशेः कैवल्यम्॥

अर्थ: जब अविद्या का नाश होता है, तब आत्मा और चित्त का संयोग भी समाप्त हो जाता है – यही कैवल्य (मोक्ष) है।


26. विवेकख्यातिरविप्लवा हानोपायः॥२६॥
अर्थ: विकारों के नाश का उपाय है – अविचल विवेक (सत्य और असत्य का स्थिर ज्ञान)।


27. तस्य सप्तधा प्रान्तभूमिः प्रज्ञा॥२७॥
अर्थ: उस विवेकयुक्त ज्ञान की सात अवस्थाएँ होती हैं, जो पूर्ण प्रज्ञा (आत्मिक ज्ञान) की ओर ले जाती हैं।


28. योगाङ्गानुष्ठानादशुद्धिक्षये ज्ञानदीप्तिराविवेकख्यातेः॥२८॥
अर्थ: योग के अंगों के अभ्यास से अशुद्धियाँ नष्ट होती हैं और ज्ञान का प्रकाश उत्पन्न होता है, जिससे विवेक उत्पन्न होता है।


.     आरंभ होते हैं “अष्टाङ्ग योग” के आठ अंग:

29यम नियमासन प्राणायाम प्रत्याहार धारणा ध्यान समाधयोऽष्टावङ्गानि॥२९॥
हिंदी अर्थ:
अष्टांग योग के आठ अंग हैं — यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि।


30. अहिंसासत्यास्तेय ब्रह्मचर्यापरिग्रहा यमाः॥३०॥
अर्थ: अहिंसा, सत्य, अस्तेय (चोरी न करना), ब्रह्मचर्य (इंद्रिय संयम) और अपरिग्रह (संचय न करना) – ये पांच यम हैं।


31. जातिदेशकालसमयानवच्छिन्नाः सार्वभौमा महाव्रतम्॥३१॥
अर्थ: ये यम किसी जाति, देश, समय या परिस्थिति से सीमित नहीं हैं। ये सार्वभौमिक और महान व्रत हैं।


32 . शौच संतोष तपः स्वाध्याय ईश्वरप्रणिधानानि नियमाः॥३२॥
अर्थ: शौच (शुद्धि), संतोष, तप, स्वाध्याय (शास्त्रों का अध्ययन) और ईश्वरप्रणिधान – ये पांच नियम हैं।


33. वितर्कबाधने प्रतिपक्षभावनम्॥३३॥
अर्थ: जब मन में दोषपूर्ण विचार (वितर्क) आएँ तो उनके विपरीत विचारों का चिंतन करना चाहिए।


34. वितर्का हिंसादयः कृतकारितानुमोदिता लोभक्रोधमोपूर्वका मृदुमध्याधिमात्र दुःखाज्ञानानन्तफल इति प्रतिपक्षभावनम्॥३४॥
अर्थ: हिंसा आदि दोष चाहे स्वयं किए गए हों, दूसरों से कराए हों या समर्थन किया गया हो, वे लोभ, क्रोध, मोह से उत्पन्न होकर दुख और अज्ञान का कारण बनते हैं। अतः इनका प्रतिकार करना आवश्यक है।


35. अहिंसाप्रतिष्ठायां तत्सन्निधौ वैरत्यागः॥३५॥
अर्थ: जिस योगी की अहिंसा सिद्ध हो जाती है, उसके पास किसी का वैर भाव नहीं ठहरता।


36 सत्यप्रतिष्ठायां क्रियाफलाश्रयत्वम्॥३६॥
अर्थ: जो सत्य में स्थित होता है, उसकी वाणी सच्ची और फलदायक हो जाती है।


37 अस्तेयप्रतिष्ठायां सर्वरत्नोपस्थानम्॥३७॥
अर्थ: जब योगी चोरी नहीं करता, तो सभी प्रकार की संपत्तियाँ स्वयं उसके पास आती हैं।


38. ब्रह्मचर्यप्रतिष्ठायां वीर्यलाभः॥३८॥
अर्थ: ब्रह्मचर्य में स्थित योगी को अपार ऊर्जा और तेज की प्राप्ति होती है।


39. अपरिग्रहस्थैर्ये जन्मकथंतासंबोधः॥३९॥
अर्थ: जिसने संग्रह करना छोड़ दिया है, उसे अपने पूर्वजन्मों की जानकारी प्राप्त होती है।


40. शौचात् स्वाङ्गजुगुप्सा परैरसंसर्गः॥४०॥
अर्थ: शरीर की शुद्धि से व्यक्ति अपने शरीर से भी विरक्ति प्राप्त करता है और दूसरों से चिपकाव नहीं रखता।


41 सत्त्वशुद्धिसौमनस्यैकाग्र्येन्द्रियजयात्मदर्शनयोग्यता च॥४१॥
अर्थ: अंत:करण की शुद्धि से मन की प्रसन्नता, एकाग्रता, इंद्रियों पर विजय और आत्मा का दर्शन संभव होता है।


42. संतोषादनुत्तमः सुखलाभः॥४२॥
अर्थ: संतोष से व्यक्ति को परम सुख की प्राप्ति होती है।


43. कायेन्द्रियसिद्धिरशुद्धिक्षयात्तपसः॥४३॥
अर्थ: तपस्या से शरीर और इंद्रियाँ सिद्ध होती हैं, क्योंकि अशुद्धियाँ नष्ट हो जाती हैं।


44. स्वाध्यायादिष्टदेवतासंप्रयोगः॥४४॥
अर्थ: स्वाध्याय (शास्त्रों व जप का अभ्यास) से ईष्टदेवता से संपर्क स्थापित होता है।


45. ईश्वरप्रणिधानाद्वा समाधिसिद्धिः॥४५॥
अर्थ: ईश्वर को समर्पित भाव से योगी को समाधि की सिद्धि प्राप्त होती है।


46. स्थिरसुखमासनम्॥४६॥
अर्थ: आसन वह है जो स्थिर (स्थाई) और सुखद (आरामदायक) हो।


47. प्रयत्नशैथिल्यानन्तसमापत्तिभ्याम्॥४७॥
अर्थ: आसन सिद्ध करने के लिए प्रयास का शिथिल होना (तनाव रहित होना) और अनंत (ईश्वर) में ध्यान लगाना आवश्यक है।


48. ततो द्वन्द्वानभिघातः॥४८॥
अर्थ: जब आसन सिद्ध हो जाता है, तो ठंड-गर्मी जैसे द्वंद्व योगी को प्रभावित नहीं करते।


49. तस्मिन्सति श्वासप्रश्वासयोर्गतिविच्छेदः प्राणायामः॥४९॥
अर्थ: आसन सिद्ध होने के बाद श्वास-प्रश्वास की गति को रोकना ही प्राणायाम कहलाता है।


50. बाह्याभ्यंतरस्तम्भवृत्तिर्देशकालसंख्याभिः परिदृष्टो दीर्घसूक्ष्मः॥५०॥
अर्थ: प्राणायाम में श्वास का बाहर जाना (बाह्य), अंदर जाना (अभ्यंतर) और रोकना (स्तम्भ) इन तीन अवस्थाओं को देश (स्थान), काल (समय) और संख्या (गणना) से नियंत्रित किया जाता है, जिससे वह लंबा और सूक्ष्म बनता है।


51. बाह्याभ्यंतरविषयाक्षेपी चतुर्थः॥५१॥
अर्थ: जो प्राणायाम बाह्य और अभ्यंतर से परे होता है, वह चतुर्थ प्राणायाम कहलाता है (यह बहुत सूक्ष्म और उच्च अवस्था है)।


52. ततः क्षीयते प्रकाशावरणम्॥५२॥
अर्थता है।: प्राणायाम से ज्ञान पर पड़ा अज्ञान का आवरण दूर हो जा


53. धारणासु  योग्यता मनसः॥५३॥
अर्थ: प्राणायाम से मन धारणा के योग्य बन जाता है (एकाग्रता के लिए तैयार होता है)।


54. स्वविषयासम्प्रयोगे चित्तस्वरूपानुकार इव इन्द्रियाणां प्रत्याहारः॥५४॥
अर्थ: जब इंद्रियाँ अपने विषयों से हटकर चित्त के अधीन हो जाती हैं, तो उसे प्रत्याहार कहते हैं।


55 ततः परमावश्यता इन्द्रियाणाम्॥५५॥
अर्थ: प्रत्याहार से इंद्रियों पर परम नियंत्रण प्राप्त होता है।


विभूति पाद – 55 सूत्र

(Patanjali Yogsutra)

इस अध्याय में योग के अभ्यास से उत्पन्न होने वाली अद्भुत सिद्धियाँ (विभूतियाँ)धारणा, ध्यान, और समाधि — इन तीनों को मिलाकर बनने वाली संयम की शक्ति, और उससे प्राप्त होने वाली आंतरिक शक्तियाँ (सिद्धियाँ) बताई गई हैं।

1. देशबन्धश्चित्तस्य धारणा॥
अर्थचित्त को किसी एक स्थान पर बाँधना ही धारणा (Concentration) है।


2. तत्र प्रत्ययैकतानता ध्यानम्॥
अर्थ:उसी विषय में लगातार एकरूप विचार करना ध्यान (Meditation) कहलाता है।


3. तदेवार्थमात्रनिर्भासं स्वरूपशून्यमिव समाधिः॥
अर्थजब केवल ध्येय वस्तु ही प्रकाशमान हो जाए और चित्त का स्वरूप विलीन हो जाए, तो वह समाधि कहलाती है।


4. त्रयम् एकत्र संयमः॥
अर्थधारणा, ध्यान और समाधि – इन तीनों का एक साथ होना संयम कहलाता है।


5. तज्जयात् प्रज्ञालोकः॥
अर्थसंयम की सिद्धि से ज्ञान का प्रकाश प्राप्त होता है।


6. तस्य भूमिषु विनियोगः॥
अर्थइस संयम का विभिन्न अवस्थाओं में उपयोग किया जा सकता है।


7. त्रयम् अन्तरङ्गं पूर्वेभ्यः॥
अर्थयह त्रय (धारणा, ध्यान, समाधि) पहले के अभ्यासों की तुलना में अंतरंग (भीतर का अभ्यास) है।


8. तदपि बहिरङ्गं निरबीजस्य॥
अर्थलेकिन यह भी निर्बीज समाधि की तुलना में बाह्य अभ्यास है।


9. व्युत्थाननिरोधसंस्कारयोः अभिभवप्रादुर्भावौ निरोधक्षणचित्तान्वयः निरोधपरिणामः॥
अर्थचित्त में रोक और चंचलता के संस्कारों के आने-जाने की प्रक्रिया को निरोध-परिणाम कहते हैं।


10. तस्य प्रशान्तवाहिता संस्कारात्॥
अर्थइस निरोध की स्थिति में मन की प्रवृत्ति बहुत शांत हो जाती है, यह अभ्यास के संस्कारों से होता है।


11. सर्वार्थता एकाग्रतयोः क्षयोदयौ चित्तस्य समाधिपरिणामः॥
अर्थजब चित्त की अनेक वृत्तियाँ समाप्त होकर एक ही विषय में स्थिर हो जाएँ, तो यह समाधि का रूपांतरण (parinama) है।


12. ततोऽन्यः संयमात् परिणामत्रयस्य॥
अर्थइन तीनों परिवर्तनों (निरोध, समाधि, एकाग्रता) को संयम से जाना जा सकता है।


13. एतेन भूतेंद्रियेषु धर्मलक्षणावस्थापरिणामा व्याख्याताः॥
अर्थइसके द्वारा भूत और इन्द्रियों के धर्म, लक्षण और अवस्था के परिवर्तन को भी समझा जा सकता है।


14. शान्तोदिताव्यपदेश्यधर्मानुपाती धर्मी॥
अर्थवस्तु एक ऐसी सत्ता है जिसमें शांत (बीते), उदित (वर्तमान) और अव्यक्त (भावी) गुण रहते हैं।


15. कारणत्वात् परिणामानाम्॥
अर्थकारण के अनुसार ही परिणाम होते हैं।


16. परिणामत्रयसंयमादतीतानागतज्ञानम्॥
अर्थइन तीन परिवर्तनों पर संयम करने से अतीत और भविष्य का ज्ञान होता है।


17. शब्दार्थप्रत्ययानाम् इतरेतराध्यासात् संकरस् तत्प्रविभागसंयमात् सर्वभूतरुतज्ञानम्॥
अर्थशब्द, अर्थ और ज्ञान के मिश्रण से भ्रम होता है; इनका पृथक्करण करने पर सभी प्राणियों की भाषा का ज्ञान होता है।


18. संस्कारसाक्षात्करणात् पूर्वजातिज्ञानम्॥
अर्थसंस्कारों के ज्ञान से पूर्व जन्मों का ज्ञान प्राप्त होता है।


19. प्रतीयस्यानुपश्यः चित्तस्य परचित्तज्ञानम्॥
अर्थकिसी के चित्त पर ध्यान करने से उसके मन के विचारों को जाना जा सकता है।


20.   तत् सालम्बनं तस्याविषयीभूतत्वात्॥
अर्थपरंतु यह ज्ञान उस विषय तक सीमित नहीं होता, केवल चित्त के विचार ही जाने जाते हैं।


21. कायरूपसंयुक्तस्य चैतन्यस्यान्यात्म्यं रूपसंयमात् चक्षुःप्रकाशासंप्रयोगेऽन्तर्धानम्॥
अर्थशरीर के रूप और चैतन्य के एकत्व पर संयम करने से, नेत्र के प्रकाश से संपर्क टूट जाने पर अदृश्य हो जाता है।


22. एतेन शब्दाद्यन्तर्धानम् उक्तम्॥
अर्थइसी प्रकार ध्वनि आदि इन्द्रिय विषयों का भी अदृश्य होना संभव है।


23. सौक्ष्म्यात् तदुपरगमं निर्ग्राह्यत्वम्॥
अर्थअत्यंत सूक्ष्मता के कारण वह इन्द्रियों की पकड़ से बाहर हो जाता है।


24. चित्तस्य प्रत्यसामवायः पूर्वभवः॥
अर्थचित्त के संस्कारों से उसके पूर्व जन्म का ज्ञान होता है।


25. नामरूपकर्मणि संयमात् तत्संस्कारज्ञानम्॥
अर्थनाम, रूप और कर्म पर संयम करने से संस्कारों का ज्ञान होता है।


26. केवले  प्रज्ञा॥
अर्थअकेले आत्मतत्त्व पर ध्यान करने से पूर्ण आत्मज्ञान प्राप्त होता है।


27. तच्च्छ्रौत्रं अपि॥
अर्थइस आत्मज्ञान का वर्णन शास्त्रों में भी किया गया है।


28. हृदयस्य प्रत्ययाद् चित्तसंपृक्तज्ञानम्॥
अर्थहृदय (हृदयदेश) पर संयम से चित्त की प्रवृत्तियों का ज्ञान होता है।


29. सत्त्वपुरुषयोरत्यन्तासङ्कीर्णयोः प्रत्ययाविशेषो भोगः॥
अर्थजब सत्त्व (प्रकृति) और पुरुष के संयोग का भेद नहीं समझा जाता, तभी भोग होता है।


30. ततः पुनः शान्तोदितौ तुल्यप्रत्ययौ चित्तस्य एकाग्रता परिणामः॥
अर्थजब चित्त के शांत और उठते विचार एक जैसे हो जाते हैं, तब एकाग्रता का परिणाम होता है।


31. ततः मनोजवित्वं विकरणभावः प्रधानजयश्च॥
अर्थतब योगी की गति मन के समान तेज हो जाती है, इन्द्रियाँ वश में रहती हैं, और प्रकृति पर विजय प्राप्त होती है।


32. सत्त्वपुरुषयोः शुद्धिसाम्ये कैवल्यम्॥
अर्थजब सत्त्व (बुद्धि) और पुरुष (आत्मा) की शुद्धि समान हो जाती है, तब कैवल्य (मोक्ष) प्राप्त होता है।


33. क्षणतत्क्रमयोः संयमात् विवेकजं ज्ञानम्॥
अर्थप्रत्येक क्षण और उसके क्रम पर संयम करने से विवेक द्वारा उत्पन्न ज्ञान प्राप्त होता है।


34. जातिलक्षणदेशैरन्यतानवच्छेदात् तुल्ययोः ततः प्रतिपत्तिः॥
अर्थजब दो वस्तुएँ एक जैसी दिखें, तब उनके जन्म, गुण और स्थान पर ध्यान करने से वास्तविक पहचान हो जाती है।


35. तारकं सर्वविषयं सर्वथाविषयम् अक्रमं चैतद्विवेकजं ज्ञानम्॥
अर्थयह विवेक से उत्पन्न ज्ञान सब विषयों को जानने वाला होता है और बिना क्रम के भी सत्य को जान लेता है।


36. सत्त्वपुरुषयोः शुद्धिसाम्ये कैवल्यम्॥
अर्थजब बुद्धि और आत्मा की शुद्धि समान हो जाती है, तब मुक्ति (कैवल्य) होती है।


37. ततः कायेन्द्रियसिद्धिः॥
अर्थइस ज्ञान से शरीर और इन्द्रियों की सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं।


38. रुपलावण्यबलवज्रसंहननत्वानि कायसंपत्॥
अर्थशरीर सुंदर, बलवान, कठोर और अमोघ बनता है।


39. ग्रहणस्वरूपास्मितान्वयार्थवत्त्वसंयमात् इन्द्रियजयः॥
अर्थइन्द्रियों के ग्रहण, उनके स्वरूप, अहंभाव, कार्य और उद्देश्य पर संयम करने से इन्द्रियों पर विजय प्राप्त होती है।


40. ततो मनोजवित्वं विकरणभावः प्रधानजयश्च॥
अर्थतब मन जैसी गति प्राप्त होती है, इन्द्रियों का विलय हो जाता है, और प्रकृति पर विजय मिलती है।


41. सत्त्वपुरुषयोः शुद्धिसाम्ये कैवल्यम्॥
अर्थजब सत्त्व (बुद्धि) और पुरुष (आत्मा) की पूर्ण शुद्धि हो जाए, तब कैवल्य (मोक्ष) होता है।


42. ततो क्लेशकर्मनिवृत्तिः॥
अर्थइससे योगी के सब पाप और कर्म नष्ट हो जाते हैं।


43. ततः सर्वावरणमलापेतस्य ज्ञानस्यानन्त्याज्ज्ञेयमल्पम्॥
अर्थजब सब आवरण हट जाते हैं, तब ज्ञान अनंत हो जाता है और जानने योग्य वस्तुएँ बहुत कम रह जाती हैं।


44. ततो विवेकनिम्नं कैवल्यप्राग्भारं चित्तम्॥
अर्थफिर चित्त केवल विवेक में स्थित होता है और कैवल्य की ओर अग्रसर होता है।


45. तद्वैराग्यातपि दोषबीजक्षये कैवल्यम्॥
अर्थउस (ज्ञान) में भी वैराग्य करने पर दोषों के बीज भी नष्ट हो जाते हैं और मोक्ष प्राप्त होता है।


46. स्थान्युपनिमन्त्रणे सङ्गस्मयाकरणं पुनरनिष्टप्रसङ्गात्॥
अर्थयोगी को जब दिव्य शक्तियाँ आमंत्रित करें, तो वह अहंकार या आकर्षण में न पड़े, अन्यथा पतन हो सकता है।


47. क्षणतत्क्रमयोः संयमात् विवेकजं ज्ञानम्॥
अर्थ:क्षण और उसके क्रम पर संयम से विवेकपूर्ण ज्ञान प्राप्त होता है।


48. जातिलक्षणदेशैरन्यतानवच्छेदात् तुल्ययोस्ततः प्रतिपत्तिः॥
अर्थदो एक जैसे दिखने वाले पदार्थों में भेद करना संभव हो जाता है।


49. तारकं सर्वविषयं सर्वथाविषयमक्रमं च॥
अर्थयह ज्ञान सब कुछ जानने योग्य बनाता है, चाहे वह क्रम में हो या न हो।


50. विवेकख्यातेरविप्लवा हानोपायः॥
अर्थजब यह विवेकज्ञान अविचलित हो जाता है, तभी दुःख की पूर्ण निवृत्ति होती है।


51. तद्वैराग्यादपि दोषबीजक्षये कैवल्यम्॥
अर्थउस सिद्धि से भी वैराग्य करने पर दोषों के बीज नष्ट हो जाते हैं और कैवल्य प्राप्त होता है।


52. स्थान्युपनिमन्त्रणे सङ्गस्मयाकरणं पुनरनिष्टप्रसङ्गात्॥
अर्थअगर देवता योगी को आमंत्रित करें तो उनमें अहंकार न हो, नहीं तो अनिष्ट हो सकता है।


53. क्षणतत्क्रमयोः संयमात् विवेकजं ज्ञानम्॥
अर्थ: (पुनः) क्षण और उसके क्रम पर संयम से विवेकपूर्ण ज्ञान उत्पन्न होता है।


54. जातिलक्षणदेशैरन्यतानवच्छेदात् तुल्ययोः ततः प्रतिपत्तिः॥
अर्थएक जैसे दिखने वाली चीज़ों को उनके गुण, स्थान, जन्म आदि के आधार पर अलग करना संभव होता है।


55. तारकं सर्वविषयं सर्वथाविषयमक्रमं चैतद्विवेकजं ज्ञानम्॥
अर्थयह विवेक से उत्पन्न ज्ञान सभी वस्तुओं को जानने योग्य बनाता है, चाहे वह किसी भी प्रकार की हो।


कैवल्य पाद – 34 सूत्र

(Patanjali Yogsutra)

1. जन्मौषधिमन्त्रतपःसमाधिजाः सिद्धयः॥

अर्थ: सिद्धियाँ (अलौकिक शक्तियाँ) जन्म से, औषधि से, मंत्र से, तप से और समाधि से प्राप्त हो सकती हैं।


2. जात्यन्तरपरिणामः प्रकृत्यापूरात्॥

अर्थ: एक जन्म से दूसरे जन्म में परिवर्तन प्रकृति के कारण होता है।


3. निमित्तम् अप्रयोेजकं प्रकृतीनां। वराणाम्।

अर्थ: बाह्य कारण प्रकृति को प्रेरित नहीं करते, वे केवल सहायक होते हैं।


4. निर्माणचित्तानि अस्मितामात्रात्॥

अर्थ: योगी अपनी इच्छानुसार अनेक चित्तों (मन) की रचना कर सकता है।


5. प्रवृत्तिभेदे प्रयोजकं चित्तम् एकम् अनेकेषाम्॥

अर्थ: अनेक मन (चित्त) अलग-अलग कार्य करते हैं, लेकिन प्रेरणा एक ही चित्त से होती है।


6. तत्र ध्यानजम् अनाशयम्॥

अर्थ: ध्यान से उत्पन्न चित्त बिना संस्कार (कर्मफल) के होता है।


7. कर्माशुक्लाकृष्णं योगिनस्त्रिविधमितरेषाम्॥

अर्थ: योगियों का कर्म न शुभ होता है, न अशुभ। लेकिन सामान्य जन का कर्म तीन प्रकार का होता है – शुभ, अशुभ, मिश्र।


8. तत्र पूर्ववसिकेतुः॥

अर्थ: योगी के चित्त में पहले से संस्कार होने के कारण वही आगे भी फलदायी होता है।


9. जातिदेशकालव्यवहितानामप्यानन्तर्यं स्मृतिसंस्कारयोः एकरूपत्वात्॥

अर्थ: जन्म, देश, समय के भेद के बावजूद, स्मृति और संस्कारों के एक जैसे होने से उनका क्रम चलता रहता है।


10. तासां अनादित्वं चाशिषो नित्यत्वात्॥

अर्थ: इच्छाओं का आदि नहीं है क्योंकि आत्मा की कामना नित्य है।


11. हेतुफलाश्रयालम्बनैः सङ्गृहीतत्वादेषामभावे तदभावः॥

अर्थ: कारण, फल, आश्रय और विषय के अभाव से संस्कारों का भी अभाव हो जाता है।


12. अतीतानागतं स्वरूपतोऽस्ति अध्वभेदात् धर्माणाम्॥

अर्थ: अतीत और भविष्य वस्तुतः विद्यमान हैं, क्योंकि धर्मों का क्रम बना रहता है।


13. ते व्यक्तसूक्ष्माः गुणात्मानः॥

अर्थ: ये सभी धर्म (स्वभाव) सूक्ष्म या प्रकट रूप में गुणों से बने होते हैं।


14. परिणामैकत्वात् वस्तुतत्त्वम्॥

अर्थ: वस्तुओं की वास्तविकता उनके परिवर्तनों के एकत्व पर आधारित होती है।


15. वस्तुसाम्ये चित्तभेदात्तयोर्विभक्तः पन्थाः॥

अर्थ: एक ही वस्तु होने पर भी अलग-अलग चित्त उसे भिन्न रूप से अनुभव करते हैं।


16. न चैकचित्ततन्त्रं वस्तु तदप्रमाणकं तदा किम् स्यात्॥

अर्थ: वस्तु किसी एक मन पर निर्भर नहीं है; यदि वह प्रमाण में न आए तो क्या वह वस्तु होगी ही नहीं?


17. तदुपरागापेक्षित्वात् चित्तस्य वस्तु ज्ञाताज्ञातम्॥

अर्थ: वस्तु चित्त के संपर्क पर ही जानी या न जानी जाती है।


18. सदा ज्ञाताश्चित्तवृत्तयः तद्प्रबोधे न विद्यमाने तत्संवेदनम्॥

अर्थ: चित्तवृत्तियाँ हमेशा ज्ञात होती हैं; जब ज्ञाता (पुरुष) जाग्रत होता है तभी अनुभूति होती है।


19. न तत्स्वाभासं दृष्टेर् द्रश्यत्वात्॥

अर्थ: चित्त स्वयं को प्रकाशित नहीं करता, क्योंकि वह दृश्य (द्रश्य) है।


20. एक समये चोभयानवधारणम्॥

अर्थ: एक ही समय में ज्ञाता और ज्ञेय दोनों को जानना असंभव है।


21. चित्तान्तरदृश्ये बुद्धिबुद्धेः अतिप्रसङ्गः स्मृतिसंकरश्च॥

अर्थ: यदि एक चित्त दूसरे चित्त को देखेगा तो भ्रम और स्मृति का मिश्रण होगा।


22. चितेरप्रतिसङ्क्रमायाः तदाकारापत्तौ स्वरूपान्यत्वं इव इन्द्रियाणाम्॥

अर्थ: चित्त जब बाह्य विषय का रूप ले लेता है, तब इन्द्रियाँ उस रूप से अलग प्रतीत होती हैं।


23. द्रष्टृदृश्योपरक्तं चित्तं सर्वार्थम्॥

अर्थ: चित्त द्रष्टा और दृश्य दोनों से प्रभावित होकर सब विषयों का अनुभव करता है।


24. तदसङ्ख्येयवासनाभिश्चित्रं अपि अनन्तार्थत्वात्॥

अर्थ: अनगिनत वासनाओं के कारण चित्त अनेक रंगों से भर जाता है।


25. विशेषदर्शिन आत्मभावभावनाविनिवृत्तिः॥

अर्थ: जिसने आत्मा को अलग से जान लिया, वह अहंकार की भावना से मुक्त हो जाता है।


26. तदा विवेकनिम्नं कैवल्यप्राग्भारं चित्तम्॥

अर्थ: तब चित्त केवल विवेक में प्रवाहित होकर कैवल्य की ओर बढ़ता है।


27. तच्छिद्रेषु प्रत्ययान्तराणि संस्कारेभ्यः॥

अर्थ: यदि विवेक में अंतर आता है तो उसमें पुराने संस्कारों के कारण अन्य विचार प्रवेश कर सकते हैं।


28. हानमेषां क्लेशवदुक्तम्॥

अर्थ: इन विघ्नों को भी क्लेशों की तरह ही त्यागना होता है।


29. प्रसङ्ख्यानेऽप्यकुसीदस्य सर्वथाविवेकख्यातेर्धर्ममेघः समाधिः॥२९॥
अर्थ: जो योगी सर्वोच्च ज्ञान (प्रसङ्ख्यान) के बाद भी किसी भी वस्तु में आसक्त नहीं होता, उसे “धर्ममेघ समाधि” प्राप्त होती है — जिसमें केवल धर्म (सत्य, पुण्य, विवेक आदि) की वर्षा होती है।


30. ततः क्लेशकर्मनिवृत्तिः॥३०॥
अर्थ: धर्ममेघ समाधि के बाद योगी के सभी क्लेश (दुखों के कारण) और कर्म समाप्त हो जाते हैं।


31. तदा सर्वावरणमलापेतस्य ज्ञानस्य अनन्त्याज्ज्ञेयं अल्पम्॥३१॥
अर्थ: जब सभी अवरण (आवरण/अज्ञान) दूर हो जाते हैं, तब योगी का ज्ञान अनंत हो जाता है, और जानने योग्य वस्तुएं बहुत थोड़ी रह जाती हैं।


32. ततः कृतार्थानां परिणामक्रमसंाप्तिर्गुणानाम्॥३२॥
अर्थ: तब प्रकृति के तीनों गुण (सत्व, रज, तम) जिनका कार्य पूरा हो चुका होता है, वे परिवर्तन करना बंद कर देते हैं।


33. क्षणप्रतियोगी परिणामापरान्तनिर्ग्राह्यः क्रमः॥३३॥
अर्थ: गुणों का यह क्रमशः परिवर्तन क्षण-क्षण के अनुभव से समझा जा सकता है; यह सूक्ष्म और गहराई में जानने योग्य है।


34. पुरुषार्थशून्यानां गुणानां प्रतिप्रसंख्यायः कैवल्यं स्वरूपप्रतिष्ठा वा चितिशक्तिरेति॥३४॥
अर्थ: जब प्रकृति के गुण आत्मा के लिए (पुरुषार्थ के लिए) कुछ नहीं रह जाते, तब वे शांत हो जाते हैं, और चित्त की शक्ति अपने स्वरूप में स्थित हो जाती है — यही कैवल्य (मोक्ष) है।

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