KUndalini Yoga

Kundalini Shakti

परिचय:

kundalini shakti

कुंडलिनी जागृति योग और तंत्र परंपरा का एक अत्यंत महत्वपूर्ण और रहस्यमयी विषय है। “कुंडलिनी” एक संस्कृत शब्द है जिसका अर्थ होता है – “सर्प के समान कुण्डली मारकर बैठी हुई ऊर्जा”। यह शक्ति हर मानव शरीर में जन्म से ही मूक अवस्था में मौजूद रहती है, लेकिन साधना और आत्मिक उन्नति के माध्यम से इसे जागृत किया जा सकता है।

क्या कुंडलिनी है?

कुंडलिनी एक दिव्य शक्ति है जो हमारे शरीर के मूलाधार चक्र (रीढ़ की हड्डी के निचले भाग) में स्थित होती है। योगशास्त्रों के अनुसार, यह शक्ति तीन सर्पिलों के रूप में कुंडली मारकर सोई हुई रहती है। जब यह शक्ति जाग्रत होती है, तब यह सुषुम्ना नाड़ी से होते हुए सातों चक्रों (मूलाधार से सहस्रार तक) को पार करती है और व्यक्ति को आध्यात्मिक, मानसिक और शारीरिक स्तर पर उच्चतम स्थिति तक पहुँचा देती है।

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कुंडलिनी जागृति का उद्देश्य:

इसका मुख्य उद्देश्य आत्मज्ञान प्राप्त करना है। जब कुंडलिनी जाग्रत होती है तो साधक की चेतना उच्चतर स्तर पर पहुँचती है। वह संसार के रहस्यों को समझने लगता है, और उसकी इंद्रियाँ, मन, बुद्धि अत्यंत तेज और निर्मल हो जाती हैं। वह अपने आत्मस्वरूप को पहचानता है।

(kundalini dhakti)

कुंडलिनी जागृति के साधन:

कुंडलिनी को जाग्रत करने के लिए विभिन्न योगिक और तांत्रिक पद्धतियाँ हैं:

1. हठयोग – विशेषकर आसन, प्राणायाम, मुद्रा और बंध की सहायता से।

2. राजयोग – ध्यान और समाधि के माध्यम से।

3. क्रिया योग – विशेष ऊर्जा प्रवाह विधियों से।

4. मंत्र योग – बीज मंत्रों के जाप द्वारा।

5. गुरु कृपा – अनुभवी गुरु के स्पर्श या दृष्टि से।

सात चक्र और कुंडलिनी का मार्ग:

कुंडलिनी शक्ति जब जाग्रत होती है, तो यह नीचे से ऊपर की ओर सात चक्रों को पार करती है:

1. मूलाधार चक्र (स्थिरता)

2. स्वाधिष्ठान चक्र (रचनात्मकता)

3. मणिपुर चक्र (शक्ति और आत्मविश्वास)

4. अनाहत चक्र (प्रेम और करुणा)

5. विशुद्ध चक्र (सत्य और अभिव्यक्ति)

6. आज्ञा चक्र (आंतरिक दृष्टि)

7. सहस्रार चक्र (ईश्वर से एकत्व)

जब कुंडलिनी सहस्रार चक्र तक पहुँचती है, तब साधक को आत्म-साक्षात्कार होता है।


यहाँ कुंडलिनी के बारे में विभिन्न प्राचीन ग्रंथों में जो उल्लेख दिया गया है। यह जानकारी मूल संस्कृत ग्रंथों पर आधारित है:

1. हठयोग प्रदीपिका (Hatha Yoga Pradipika)

ग्रंथकार: स्वामी स्वात्माराम

कुंडलिनी विवेचन: अध्याय 3 – मुद्रा एवं कुंडलिनी जागरण

• श्लोक 2:

“यावद्कुण्डलिनी शक्तिः स्थिता मूकवदाचला।

तावच्छ योगविज्ञानं सूषुप्तवदवस्थितम्॥”

 अर्थ: जब तक कुंडलिनी शक्ति सुप्त है, तब तक योग का विज्ञान भी निष्क्रिय होता है।

(kundalini shakti)

 श्लोक 5:

“कुण्डलिनी बलाद्येन न नीता मार्गमण्डले।

स मृत्युभीतः सदा तिष्ठेद्योगमात्रफले रतः॥”

 अर्थ: जो साधक कुंडलिनी को सुषुम्ना मार्ग में प्रविष्ट नहीं करा पाता, वह योग के वास्तविक फल से वंचित रहता है।

• श्लोक 114:

“उद्धीयानं तु हृदयादारभ्य नाभिमावहत्।

अधो जानु-परंतं च उद्धीयानं समाभिधेयते॥”

► यहाँ बंधों और प्राणायाम के माध्यम से कुंडलिनी जागरण की विधि दी गई है।


2. शिव संहिता (Shiva Samhita)

कुंडलिनी विवेचन: अध्याय 5 – कुंडलिनी एवं योग का फल

• श्लोक 42:

“ततो योगी निपीड्यैनां पदेनोर्ध्वं प्रचालयेत्।

मारुतेन च ताम्रेण गुदं आकृष्य रेचयेत्॥”

► अर्थ: योगी को कुंडलिनी को जाग्रत करके ऊपर उठाने हेतु अभ्यास करना चाहिए।

• श्लोक 45:

“जाग्रिता सा परा शक्तिः कुन्‍डलिनी महेश्वरी।

धारणात्सर्वभूतानां कारणं योगिनां प्रिया॥

► अर्थ: जाग्रत कुंडलिनी ही वह शक्ति है जो सम्पूर्ण भूतों को धारण करती है और योगियों की प्रिय है।


3. योगकुंडली उपनिषद (Yoga Kundali Upanishad)

कुंडलिनी विवेचन:

👉 एक विशेष उपनिषद है जो श्वेताश्वतर उपनिषद की शैली में है।

• खंड 1, श्लोक 5:

“मूलस्थानमसौ शक्तिः सुषुप्तवदवस्थितम्।

जाग्रिया योगनादेन शक्तिपातं प्रयच्छति॥”

► कुंडलिनी मूलाधार में सुप्त अवस्था में रहती है, और जब योगी शक्तिपात करता है, तब वह जागती है।

• खंड 2, श्लोक 16:

“योगनादेन तां शक्तिं प्रबोधित्य नरोत्तमः।

ब्रह्मरंध्रं समासाद्य तदन्ते लीयते यदा॥”

► जब कुंडलिनी जागृत होकर सहस्रार चक्र में लीन होती है, तभी पूर्णता प्राप्त होती है।


4. योगशिखा उपनिषद (Yoga Shikha Upanishad)

कुंडलिनी विवेचन: अध्याय 1

• 13 श्लोक :

“कुण्डली सहजा देवी ब्रह्मरंध्रनिवासिनी।

सा चेत् प्रवर्तते देवी योगिनां योगसाधिका॥”

► कुंडलिनी देवी ब्रह्मरंध्र की ओर जाने वाली शक्ति है। यही योगियों की साधना का आधार है।


5. गोरक्षशतक (Goraksha Shataka)

ग्रंथकार: गुरु गोरखनाथ

कुंडलिनी विवेचन:

 श्लोक 76:

“गुदात्त्रिंशदधो नाभेः कुण्डलिन्याः सदा स्थितिः।
तस्याः प्रवर्तनं कार्यं शुद्धमार्गेण साधकैः॥”

► साधक को कुंडलिनी शक्ति को शुद्ध मार्ग (सुषुम्ना) से प्रवाहित करना चाहिए।


6. देवी भागवत पुराण

स्कंध 11, अध्याय 9 – योग और शक्ति विवेचन

• श्लोक 42:

“सा शक्तिः कुण्डली नाम देहस्थं मूलमाश्रिता।

जाग्रतं तां करोत्येव योगेन हि महामुने॥”

► कुंडलिनी ही वह मूल शक्ति है जो योग द्वारा जाग्रत की जाती है।


कुंडलिनी शक्ति जागृति के लाभ (Kundalini Shakti Jagruti ke Labh):

कुंडलिनी शक्ति जब जागृत होती है, तो यह साधक के जीवन में शारीरिक, मानसिक, आत्मिक और आध्यात्मिक स्तर पर गहरे परिवर्तन लाती है। नीचे कुंडलिनी जागरण के प्रमुख लाभों को सरल भाषा में समझाया गया है:

 1. आत्मज्ञान और मोक्ष की प्राप्ति

  • कुंडलिनी जागरण का सबसे बड़ा लाभ आत्म-साक्षात्कार है।
  • साधक को अपनी “सच्ची आत्मा” (स्वरूप) का अनुभव होता है।
  • वह जन्म-मृत्यु के चक्र से ऊपर उठकर मोक्ष की ओर अग्रसर होता है।

 2. मानसिक शांति और स्थिरता

  • मन की चंचलता, चिंता और भय समाप्त होते हैं।
  • ध्यान में गहराई आती है, और साधक सहज समाधि का अनुभव करता है।
  • बुद्धि स्पष्ट होती है और विवेक जाग्रत होता है।

 3. इंद्रियों और इच्छाओं पर नियंत्रण

  • जागृत कुंडलिनी से साधक को इंद्रिय संयम सहजता से प्राप्त होता है।
  • वासनाओं, क्रोध, लोभ, मोह आदि पर नियंत्रण आता है।

 4. ऊर्जावान और स्वस्थ शरीर

  • कुंडलिनी जागरण से शरीर में प्रचुर प्राणशक्ति (life force) प्रवाहित होती है।
  • थकावट, आलस्य और रोगों में कमी आती है।
  • प्रतिरोधक क्षमता (इम्यूनिटी) और चयापचय (metabolism) में सुधार होता है।

 5. चक्रों का शुद्धिकरण और सक्रियता

  • कुंडलिनी शक्ति सातों चक्रों को जाग्रत और संतुलित करती है:
    • मूलाधार चक्र – स्थिरता व आत्मविश्वास
    • स्वाधिष्ठान – रचनात्मकता
    • मणिपुर – शक्ति व आत्मबल
    • अनाहत – प्रेम व करुणा
    • विशुद्ध – अभिव्यक्ति व सत्य
    • आज्ञा – अंतर्ज्ञान
    • सहस्रार – ब्रह्मज्ञान

 6. अलौकिक अनुभव (Divine Experiences)

  • साधक को दिव्य दृष्टि, दिव्य श्रवण, या अन्य सिद्धियाँ प्राप्त हो सकती हैं।
  • कुछ को सपनों, ध्यान, या जाग्रत अवस्था में दिव्य ज्योति, नाद (ध्वनि), या प्रकाश के दर्शन होते हैं।

 7. व्यक्तित्व में चमत्कारी परिवर्तन

  • वाणी में प्रभाव, स्वभाव में माधुर्य और दृष्टि में करुणा आ जाती है।
  • साधक का आभामंडल (Aura) शक्तिशाली हो जाता है।

 8. रचनात्मकता और प्रतिभा में वृद्धि

  • लेखन, कला, संगीत, शोध, विज्ञान आदि में नए विचार और प्रेरणा उत्पन्न होती है।
  • मानसिक क्षमताएँ कई गुना बढ़ जाती हैं।

 9. गुरु और ईश्वर के साथ संबंध

  • साधक को ईश्वर की कृपा और गुरु की चेतना का सीधा अनुभव होता है।
  • एक आंतरिक मार्गदर्शन हमेशा साथ रहने लगता है।

 10. करुणा और सेवा भावना का जागरण

  • कुंडलिनी जाग्रत व्यक्ति समाज और संसार की भलाई के लिए कार्य करता है।
  • उसमें स्वार्थ की भावना मिट जाती है, और सेवा उसका धर्म बन जाता है।

📌 निष्कर्ष:

(kundalini shakti)

कुंडलिनी एक सार्वभौमिक आध्यात्मिक शक्ति है जिसका वर्णन उपनिषदों, योग ग्रंथों, तंत्र साहित्य, और भक्ति परंपरा में विस्तार से किया गया है। हर ग्रंथ का अपना दृष्टिकोण है, परंतु सभी में यह बात स्पष्ट है कि कुंडलिनी का जागरण ही साधक के जीवन का चरम लक्ष्य है।