History of Yoga (योग का इतिहास)

🕉️ योग का इतिहास (योग की विस्तृत जानकारी) 1. वैदिक काल में योग का इतिहास योग की शुरुआत भारत की प्राचीन वैदिक सभ्यता में हुई मानी जाती है। 2. उपनिषद काल में योग का इतिहास Please visit above Hatha Yoga Texts 3. महाभारत और भगवद्गीता काल में योग का इतिहास 4. पतंजलि योगसूत्र में योग […]

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Hatha Yoga Texts

हठयोग के प्रमुख ग्रंथ और उनका संक्षिप्त परिचय (हिंदी में): Hatha Yoga Texts 1. हठप्रदीपिका (Hatha Pradipika) 2. घेरंड संहिता (Gheranda Samhita) Please visit above Patanjali yogsutra 3. शिव संहिता (Shiva Samhita) 4. गोरक्ष संहिता / गोरक्ष शतक (Goraksha Samhita / Goraksha Shataka) 5. हठरत्नावली (Hatharatnavali) 6. सिद्ध-सिद्धांत पद्धति (Siddha Siddhanta Paddhati) 7. अमृतसिद्धि (Amritasiddhi) […]

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Blog by VPyoga

Patanjali Yogsutra (195 sutra)

प्रथम पाद समाधिपाद – 51 (Patanjali Yogsutra ) 1.अथयोगानुशासनम्। अर्थ: अब योग का अनुशासन (शिक्षा या शास्त्र) शुरू होता है। 2. योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः। अर्थ: योग का अर्थ है चित्त की वृत्तियों का निरोध  (रोकना या नियंत्रण)। 3. तदा द्रष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम्। अर्थ: तब (जब चित्त शांत होता है), देखने वाला (पुरुष)  अपने स्वरूप में स्थित होता है। 4. वृत्तिसारूप्यमितरत्र। अर्थ: अन्यथा (जब चित्त शांत नहीं होता), आत्मा चित्त की वृत्तियों  के साथ एकरूप हो जाता है। 5. वृत्तयः पंचतय्यः क्लिष्टाक्लिष्टाः। अर्थ: चित्त की वृत्तियाँ पाँच प्रकार की होती हैं – वे कष्टदायक (क्लिष्ट) या अक्लिष्ट भी हो सकती हैं। 6. प्रमाणविपर्ययविकल्पनिद्रास्मृतयः। अर्थ: वे पाँच वृत्तियाँ हैं – प्रमाण, विपर्यय, विकल्प,  निद्रा और स्मृति। 7. प्रत्यक्षानुमानागमाः प्रमाणानि। अर्थ: प्रत्यक्ष (सीधा अनुभव), अनुमान और शास्त्र का प्रमाण – ये तीन प्रमाण के प्रकार हैं। 8. विपर्ययो मिथ्याज्ञानमतद्रूपप्रतिष्ठम्। अर्थ: विपर्यय (भ्रम) वह मिथ्या ज्ञान है, जो वस्तु के वास्तविक  स्वरूप के विपरीत होता है। 9. शब्दज्ञानानुपाती वस्तुशून्यो विकल्पः। अर्थ: विकल्प वह ज्ञान है जो केवल शब्दों के आधार पर होता है,  लेकिन उसका कोई वस्तुगत आधार नहीं होता। 10. अभावप्रत्ययालम्बना वृत्तिर्निद्रा। अर्थ: जो वृत्ति अभाव (कुछ भी न होने) का अनुभव कराती है,  वह निद्रा (नींद) है। Please visit above Hatha yoga texts 11. अनुभूतविषयासंप्रमोषः स्मृतिः। अर्थ: जो वस्तुएँ अनुभव की गई हैं, उनका न भूलना स्मृति  कहलाता है। 12. अभ्यासवैराग्याभ्यां तन्निरोधः। अर्थ: अभ्यास और वैराग्य से उन वृत्तियों का निरोध (नियंत्रण) होता है। 13. तत्र स्थितौ यत्नोऽभ्यासः। अर्थ: चित्त को एक स्थिति में स्थिर रखने का प्रयास – यही अभ्यास है। 14. स तु दीर्घकालनैरन्तर्यसत्कारासेवितो दृढभूमिः। अर्थ: जब अभ्यास लंबे समय तक, बिना रुके और श्रद्धा से  किया जाए, तब वह दृढ होता है। 15. दृष्टानुश्रविकविषयवितृष्णस्य वशीकारसंज्ञा वैराग्यम्। अर्थ: जो व्यक्ति दृश्य और श्रवण इन्द्रियों के विषयों में भी राग  नहीं रखता, उसकी वशीकरण शक्ति वैराग्य कहलाती है। 16. तत्परं पुरुषख्यातेर्गुणवैतृष्ण्यम्। […]

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